अध्याय 1: लौटते कदम
विवेक, प्रवेग और रिशु बचपन के तीन सबसे अच्छे दोस्त थे। उनका गाँव पहाड़ों और खेतों से घिरा हुआ था। बचपन से ही उन्होंने एक-दूसरे के साथ खेला, पढ़ाई की और बड़े सपने देखे थे। लेकिन गरीबी ने उन्हें गाँव छोड़कर शहर जाने पर मजबूर कर दिया।
शहर में तीनों एक फैक्ट्री में काम करने लगे। सुबह से देर रात तक मेहनत करते, ताकि अपने परिवारों को पैसे भेज सकें। कई साल बीत गए। ज़िंदगी कठिन थी, लेकिन उम्मीद अभी भी ज़िंदा थी।
एक दिन फैक्ट्री में जहरीले रसायनों के संपर्क में आने से तीनों की तबीयत बिगड़ने लगी। पहले हल्की खाँसी हुई, फिर तेज़ बुखार, साँस लेने में तकलीफ़ और लगातार कमजोरी। डॉक्टरों ने जाँच के बाद गंभीर बीमारी बताई। इलाज बहुत महँगा था, और उनके पास इतने पैसे नहीं थे।
विवेक ने धीरे से कहा,
"अगर आख़िरी दिन ही बचे हैं... तो मैं अपने गाँव में बिताना चाहता हूँ।"
प्रवेग और रिशु ने उसकी बात से सहमति जताई।
तीनों ने अपनी थोड़ी-सी जमा पूँजी इकट्ठी की और गाँव लौटने का फैसला किया।
जब बस गाँव के रास्ते पर पहुँची, तो खिड़की से आती ठंडी हवा ने उन्हें बचपन की याद दिला दी। वही खेत, वही पेड़, वही मिट्टी की खुशबू... लेकिन इस बार लौटने की खुशी नहीं, बल्कि एक गहरा दर्द उनके साथ था।
गाँव पहुँचते ही लोगों ने उन्हें घेर लिया। किसी ने पूछा,
"अरे, तुम लोग अचानक वापस कैसे आ गए?"
तीनों मुस्कुरा तो दिए, लेकिन किसी ने सच नहीं बताया।
रात को वे पुराने बरगद के नीचे बैठे। चाँदनी फैली हुई थी।
रिशु ने आसमान की ओर देखते हुए कहा,
"याद है... हम यहीं बैठकर सोचते थे कि शहर जाकर बहुत बड़े आदमी बनेंगे।"
प्रवेग की आँखें भर आईं।
"हाँ... लेकिन ज़िंदगी ने कुछ और ही लिख रखा था।"
विवेक ने मिट्टी की एक मुट्ठी उठाई और कहा,
"अगर सच में आख़िरी समय आ गया है... तो मैं इसी मिट्टी में चैन से सोना चाहता हूँ।"
तीनों दोस्त देर रात तक अपने बचपन की बातें करते रहे। उन्हें पता था कि उनकी बीमारी अब अंतिम अवस्था में पहुँच चुकी है। फिर भी उन्होंने तय किया कि बचा हुआ हर दिन वे अपने गाँव, अपने परिवार और एक-दूसरे के साथ बिताएँगे।
उन्हें यह नहीं मालूम था कि आने वाले दिन उनके जीवन की सबसे कठिन परीक्षा बनने वाले हैं।

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